IAS: दो वक्त की रोटी का भी नही हो पाता था गुजारा, घर बेचकर बने IAS

UPSC पास करना लाखों युवाओं का सपना होता है। इसमें अधिकतर गरीब परिवार के  उम्मीदवार ही शामिल होते है। IAS Govind Jaiswal के घर में दो वक्त की रोटी का गुजारा भी बड़ी मुश्किल से होता था। 
 
IAS GOVIND

Newz Fast, Success Story: भारत में रोजगार का मिल पना बेहद मुश्किल है। लेकिन अगर  ब्हतर करियर की बात करें तो वो केवल UPSC की परिक्षा पास करने पर ही मिलता है। 

एक आईएए की वर्दी का जो रोब होता है वो इंसान की खूबसूरती को चार चांद लगा देती है। लेकिन ये देखने में जितनी खूबसूरत लगती है इस पाना भी उतना ही मुश्किल है। 

ये वर्दी उन लोगों पर ज्यादा खिलती है जो अपनी जरुरत की छोटी-छोटी चीजों के भी मोहताज होते है लेकिन अपनी कड़ी मेहनत और लगन से अपनी मजिलों को पाने में कामयाब हो जाते है। 

IAS Officer Govind Jaiswal पहले इंजिनियर की पढ़ाई करते थे लेकिनअपने घर के हालातों को देखकर उन्होने IAS बनने का ठान लिया। 

बड़ी मुश्किल से होता था दो वक्त की रोटी का गुजारा

हम बात कर रहें हैं आईएएस ऑफिसर गोविंद जयसवाल की। इनके पिता एक रिक्शा चालक थे। बनारस की तंग गलियों में 12 x 8 के किराये के मकान में रहने वाला गोविंद का परिवार दो वक्त की रोटी का भी बड़ी मुश्किल से गुजारा कर पाता था।

बता दें कि गोविंद के घर में उनके माता-पिता के अलावा उनकी दो बहनें भी हैं। ऊपर से उनका घर ऐसी जगह पर था, जहां शोर-गुल की कोई कमी नहीं थी। 

उनके घर के आस-पास मौजूद फक्ट्रियों और जनरेटरों के शोर में एक दूसरे से बात करना भी काफी मुश्किल होता था। यहां तक कि नहाने-धोने से लेकर खाने-पीने तक का सारा काम इसी छोटी से घर में करना पड़ता था। 

हालांकि, ऐसी  परिस्थिति में रहने के बाद भी गोविंद नें शुरू से पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया था।

कक्षा 8वीं में ही पढ़ाने लगे ट्यूशन 

घर की आर्थिक स्थिति के खराब होने के कारण गोविंद ने अपनी पढाई और किताबों का खर्च निकालने के लिए कक्षा 8वीं में ही अपने से छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था।

पिता के रिक्शा चालक होने और घर की आर्थिक के खराब होने के कारण लोग कई बार गोविंद को यह ताना भी देते थे कि "चाहे तुम जितना भी पढ़ लो चलाना तो तुम्हें रिक्शा ही है।" 

हालांकि, गोविन्द ने इन सब के बावजूद पढ़ाई से अपना ध्यान कभी नहीं भटकने दिया। गोविन्द कहते हैं कि "मुझे Divert करना असंभव था। अगर कोई मुझे Demoralize करता था, तो मैं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचने लगता था।"

अक्सर मोमबत्ती या डिबिया जलाकर करते थे पढ़ाई

गोविंद कई बार घर के आस-पास के शोर से इतना परेशान हो जाते थे कि वे अपने कानों में रूई लगा कर पढ़ाई किया करते थे। जब उन्हें ज्यादा परेशानी होती थी तो वे मैथ्स के सवालों को हल करने में लग जाते थे। 

वहीं, रात के समय जब शांति होती थी तब वे बाकी सब्जेक्ट्स की पढ़ाई किया करते थे। इसके अलावा उनके यहां 12 से 15 घंटे के करीब बिजली की कटौती रहती थी, जिस कारण उन्हें अक्सर मोमबत्ती या डिबिया जलाकर पढ़ाई करनी पड़ती थी।   

मात्र इतने रुपए के कारण छोड़नी पड़ी इंजीनियरिंग

गोविंद अपने स्कूल के टॉपर रह चुके थे, जिस कारण लोगों ने उन्हें कक्षा 12वीं के बाद इंजीनियरिंग करने की सलाह दी थी। हालांकि, वो भी कुछ ऐसा ही चाहते थे, लेकिन जब उन्हें पता चला की एप्लिकेशन फॉर्म भरने की फीस 500 रुपए है, 

तो उन्होंने इंजीनियरिंग करने का आइडिया ड्रोप कर दिया और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया, जहां उन्हें मात्र 10 रुपए की औपचारिक फीस भरनी होती थी।

घर की जमीन बेचकर की UPSC की तैयारी

कॉलेज के दौरान ही गोविंद ने यूपीएससी परीक्षा का तैयारी करने की सोची और उसी समय से तैयारी में जुट गए। कॉलेज खत्म होने के बाद भी गोविंद अपने आईएएस ऑफिसर बनने के सपने को साकार करने के लिए पढ़ाई कर रहे थे। 

परीक्षा की फाइनल और अच्छी तैयारी के लिए गोविंद जैसे-तैसे करके दिल्ली आ गए। हालांकि, उसी दौरान उनके पिता के पैर में एक गहरा घाव हो गया और वे पूरी तरह से बेरोजगार हो गए। 

ऐसे में परिवार ने अपनी एक मात्र सम्पत्ती, एक छोटी सी जमीन को मात्र 30,000 रुपए में बेच दिया ताकि उनका बेटा अपनी यूपीएससी की कोचिंग पूरी कर सके। 

गोविंद अपने परिवार द्वारा दिए गए इस बलिदान को समझते थे, इसलिए उन्होंने अपने परिवार को निराश भी नहीं किया और मात्र 24 साल की उम्र में साल 2006 में अपने पहले ही अटेंप्ट में 48वां रैंक हासिल कर आईएएस ऑफिसर बन गए।